काउंटरपॉइंट रिसर्च के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही
में भारत के स्मार्टफोन मार्केट में साल-दर-साल 3 परसेंट की गिरावट आई, जो छह सालों में
इसका सबसे कमजोर तिमाही परफॉर्मेंस है। यह मंदी बढ़ती कीमतों, लागत के दबाव और
कमजोर कंज्यूमर डिमांड के बीच आई है,
जो
इंडस्ट्री के लिए एक मुश्किल दौर का संकेत है।
अफोर्डेबिलिटी
पर दबाव दिखने लगा है
इस गिरावट के पीछे एक मुख्य कारण
स्मार्टफोन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी है। तिमाही के दौरान 80 से ज्यादा मॉडल्स
की कीमतों में औसतन लगभग 15 परसेंट
की बढ़ोतरी हुई, और
दूसरी तिमाही में 15 परसेंट
से 20 परसेंट की और
बढ़ोतरी की उम्मीद है। यह बढ़ोतरी कंपोनेंट की बढ़ती कीमतों, खासकर मेमोरी, और करेंसी से
जुड़े दबावों के कारण हुई है।
काउंटरपॉइंट
के अनुसार, इन
कारणों से मार्केट में अफोर्डेबिलिटी पर साफ दबाव पड़ा है, जिससे ब्रांड्स
को डिमांड कम होने के बावजूद कीमतें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
Q2 में
मार्केट के कमजोर रहने की संभावना दबाव के तुरंत कम होने की उम्मीद नहीं है।
रिसर्च फर्म ने चेतावनी दी है कि 2026 की दूसरी तिमाही
में शिपमेंट में डबल-डिजिट की गिरावट देखी जा सकती है, क्योंकि ज़्यादा
कीमतें कंज्यूमर के खरीदने के फैसलों पर असर डालती रहेंगी।
इससे
पता चलता है कि मौजूदा मंदी कोई एक बार की गिरावट नहीं है, बल्कि बढ़ती लागत
और सावधानी से खर्च करने से जुड़े एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है।
वीवो
सबसे आगे, मुकाबला कड़ा बना
हुआ है
Q1 में
वीवो 21 परसेंट शेयर के
साथ भारतीय स्मार्टफोन मार्केट में सबसे आगे रहा, उसके बाद सैमसंग और ओप्पो का नंबर रहा।
रैंकिंग से पता चलता है कि टॉप तीन कंपनियों के बीच मुकाबला जारी है, भले ही कुल
मार्केट वॉल्यूम में गिरावट आई हो।
प्रीमियम सेगमेंट में मिले-जुले ट्रेंड
दिखे
जबकि
बड़े मार्केट में मुश्किल हुई, प्रीमियम
सेगमेंट ने कुछ मज़बूती दिखाई। iPhone 17 सीरीज़
की लगातार डिमांड की वजह से Apple ने
अपना शेयर बढ़ाकर 9 परसेंट
कर लिया।
इसी समय,
Google सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला प्रीमियम
ब्रांड बना, जिसके
शिपमेंट में साल-दर-साल 39 परसेंट
की बढ़ोतरी हुई, जिसे
AI-फोकस्ड फीचर्स की
डिमांड का सपोर्ट मिला। बदलाव का मार्केट मौजूदा मंदी भारतीय स्मार्टफोन मार्केट
में बदलाव को दिखाती है।
कई सालों तक, ग्रोथ किफायती
होने और अलग-अलग प्राइस सेगमेंट में अपग्रेड की वजह से हुई। अब, बढ़ती कीमतें उस
मॉडल को परखने लगी हैं, खासकर
मिड-रेंज में जहां प्राइस सेंसिटिविटी ज़्यादा बनी हुई है।
साथ
ही, प्रीमियम सेगमेंट
में डिमांड बनी हुई है, जो
वैल्यू-ड्रिवन खरीदारों और ज़्यादा खर्च करने को तैयार लोगों के बीच बढ़ते अंतर को
दिखाता है। आगे क्या होगा कीमतों में और बढ़ोतरी की उम्मीद है और डिमांड पहले से
ही दबाव में है, इसलिए
मार्केट का शॉर्ट-टर्म आउटलुक अभी भी अनिश्चित है। आने वाली तिमाहियां शायद इस बात
पर निर्भर करेंगी कि ऐसे माहौल में जहां किफायती होना एक बढ़ती हुई चिंता बनती जा
रही है, ब्रांड कस्टमर की
उम्मीदों के साथ प्राइसिंग को कैसे बैलेंस करते हैं।