रूस ने एक बार फिर क्यूबा के समर्थन में खुलकर अपनी आवाज उठाई है। अमेरिका की ओर से क्यूबा पर लगाए गए आर्थिक, व्यापारिक और वित्तीय प्रतिबंधों को लेकर रूस ने कड़ा विरोध जताया है। रूस ने स्पष्ट किया है कि वह क्यूबा के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों को अनुचित मानता है और इन्हें समाप्त करने की मांग का समर्थन करता रहेगा। 29 अक्टूबर 2026 को रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका की ओर से क्यूबा पर लगाई गई आर्थिक नाकेबंदी को समाप्त करने के प्रस्ताव के पक्ष में रूस ने मतदान किया है। रूस के मुताबिक, किसी भी संप्रभु देश पर एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसकी अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों को प्रभावित करना उचित नहीं है।
दरअसल, अमेरिका और क्यूबा के बीच प्रतिबंधों को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है। अमेरिका ने वर्ष 1962 से क्यूबा पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लागू कर रखे हैं। इन प्रतिबंधों के कारण क्यूबा को अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वित्तीय लेनदेन और विदेशी निवेश के क्षेत्र में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हाल के महीनों में अमेरिका की ओर से ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ाए जाने के बाद क्यूबा की स्थिति और मुश्किल हुई है। रूस ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि इन प्रतिबंधों का असर केवल क्यूबा की सरकार पर नहीं, बल्कि वहां रहने वाले आम लोगों पर भी पड़ रहा है। रूस के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि वासिली नेबेंजिया ने 27 अक्टूबर को अपने संबोधन में अमेरिकी प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए इन्हें समाप्त करने की मांग की थी
रूस ने अपने बयान में दावा किया कि मार्च 2025 से मार्च 2026 के बीच अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण क्यूबा को करीब 8.8 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। रूसी प्रतिनिधि ने कहा कि ऊर्जा आपूर्ति में बाधाओं के कारण बिजली संकट, पेयजल की कमी, खाद्य आपूर्ति और स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ रहा है। रूस ने यह भी कहा कि क्यूबा में लाखों लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है। हालांकि, ये आंकड़े और आरोप रूसी पक्ष की ओर से प्रस्तुत किए गए हैं
रूस और क्यूबा के बीच दशकों पुराने राजनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। रूस पहले भी क्यूबा को आर्थिक और मानवीय सहायता देने की बात कह चुका है। रूस का कहना है कि वह कठिन परिस्थितियों में क्यूबा के लोगों को सहायता देना जारी रखेगा। वहीं, अमेरिका की ओर से क्यूबा पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है। अब देखना होगा कि संयुक्त राष्ट्र में पारित प्रस्ताव के बाद अमेरिका अपनी नीति में कोई बदलाव करता है या नहीं।