अंतरजातीय विवाह के बाद सामाजिक बहिष्कार और सामुदायिक अधिकारों से वंचित किए जाने के आरोप से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से जांच करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान उपलब्ध सभी साक्ष्यों के साथ याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर भी नियमानुसार विचार किया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने एफआईआर में किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने के लिए सीधे निर्देश देने से इनकार कर दिया। मामला महासमुंद जिले की रहने वाली अंकिता प्रधान से जुड़ा है। याचिका के अनुसार अंकिता ने 2 मार्च 2026 को अंतरजातीय विवाह किया था। विवाह का प्रमाण-पत्र 8 अप्रैल 2026 को जारी किया गया। विवाह के बाद वह दंतेवाड़ा जिले के बचेली में रह रही हैं।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि अंतरजातीय विवाह के बाद समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उनका सामाजिक बहिष्कार किया और उन्हें समुदाय से जुड़े सामाजिक दर्जे एवं अधिकारों का लाभ लेने से रोकने का प्रयास किया। इसे लेकर उन्होंने संबंधित पुलिस अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। याचिकाकर्ता के मुताबिक उनकी शिकायत के आधार पर एफआईआर तो दर्ज की गई, लेकिन शिकायत में जिन निजी व्यक्तियों के नाम बताए गए थे, उनमें से सभी के नाम एफआईआर में शामिल नहीं किए गए। इसी को लेकर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि जांच अधिकारी के समक्ष कुछ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी सौंपे गए हैं। याचिकाकर्ता ने मांग की कि इन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को जांच के दौरान साक्ष्य के रूप में ध्यान में रखा जाए। साथ ही जिन निजी प्रतिवादियों के नाम शिकायत में दिए गए हैं, उनके संबंध में भी जांच की जाए। हाईकोर्ट ने मामले में किसी व्यक्ति का नाम सीधे एफआईआर में जोड़ने या जांच अधिकारी को किसी खास निष्कर्ष पर पहुंचने का निर्देश नहीं दिया। कोर्ट ने जांच अधिकारी को स्वतंत्र रूप से मामले की जांच करने और उपलब्ध सामग्री के आधार पर कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने को कहा है। अदालत के निर्देश के बाद अब जांच अधिकारी को शिकायत से जुड़े तथ्यों, उपलब्ध दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सहित अन्य साक्ष्यों की जांच करनी होगी। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर ही आगे की कार्रवाई तय होगी।