भारतीय शोधकर्ताओं ने कैंसर की संभावित जड़ का पता लगाने के लिए GenAI प्लेटफॉर्म विकसित किया

Posted on: 2026-08-22


दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IIIT-Delhi) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा जनरेटिव एआई (GenAI) प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो कैंसर के मरीजों के डीएनए में हुई क्षति का विश्लेषण कर यह पता लगाने में मदद कर सकता है कि बीमारी के विकास में किस पर्यावरणीय रसायन या विषैले पदार्थ का संभावित योगदान रहा।

शोधकर्ताओं के अनुसार, ‘MutAIverse’ दुनिया में अपनी तरह का पहला जनरेटिव एआई प्लेटफॉर्म है। इसका परीक्षण असम के गुवाहाटी में सिर और गर्दन के कैंसर से पीड़ित 27 लोगों पर किया गया। अध्ययन में मरीजों के नमूनों के विश्लेषण से संभावित जोखिम कारक के रूप में धुआंरहित तंबाकू के सेवन की पहचान की गई।

हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि मौजूदा रूप में यह तकनीक यह निर्णायक रूप से साबित नहीं करती कि किसी विशेष रसायन के कारण हुई डीएनए क्षति ने ही कैंसर पैदा किया।

इस शोध में गुवाहाटी स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPER) और CSIR-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (CSIR-IGIB) के शोधकर्ता भी शामिल थे।

कैंसर के कारणों का पता लगाने पर जोर

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक केवल कैंसर की पहचान या निदान तक सीमित रहने के बजाय उसके संभावित कारणों को समझने में मदद कर सकती है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक और IIIT-Delhi के कंप्यूटेशनल बायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर गौरव आहूजा ने कहा कि आमतौर पर यह सवाल कम पूछा जाता है कि किसी व्यक्ति को कैंसर होने के पीछे संभावित कारण क्या था और वह किन चीजों के संपर्क में आया था।

उन्होंने बताया कि हमारे आसपास का वातावरण लगातार हमें कई तरह के रसायनों के संपर्क में लाता है, जो डीएनए में बदलाव पैदा कर सकते हैं और संभावित रूप से कैंसर के विकास में भूमिका निभा सकते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी कैंसर के संभावित कारण का पता लगाने से मरीज के परिवार के सदस्यों को भी उस जोखिम से बचाने में मदद मिल सकती है, खासकर तब जब वह जोखिम उनके रहने वाले क्षेत्र में मौजूद हो।

400 से बढ़कर तीन लाख से अधिक DNA adducts

MutAIverse ने DNA adducts की मौजूदा संदर्भ लाइब्रेरी को भी काफी विस्तृत करने में मदद की है। DNA adducts ऐसे विषैले रासायनिक पदार्थ हैं, जो DNA से जुड़कर उसमें बदलाव पैदा कर सकते हैं और संभावित रूप से कैंसर का कारण बन सकते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, GenAI की मदद से उपलब्ध संदर्भ DNA adducts की संख्या 400 से कम से बढ़कर तीन लाख से अधिक हो गई है।

इस AI प्रणाली का विवरण Journal of Cheminformatics में प्रकाशित एक शोधपत्र में दिया गया है।

‘AdductLinker’ ऐसे करता है काम

MutAIverse में मशीन लर्निंग आधारित ‘AdductLinker’ नाम का एक बैकट्रैकिंग टूल शामिल है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, जब कैंसर मरीज के ट्यूमर में क्षतिग्रस्त DNA की पहचान होती है, तो AdductLinker उस क्षति से पीछे की ओर जाकर यह पता लगाने की कोशिश करता है कि कौन सा पर्यावरणीय रसायन या कार्सिनोजेन उस DNA क्षति से जुड़ा हो सकता है।

शोधकर्ताओं ने इसे जासूस द्वारा सुरागों के आधार पर पीछे की ओर जाकर कारण का पता लगाने जैसा बताया।

इस तकनीक का प्रयोग सिर और गर्दन के कैंसर के उन मरीजों के बायोप्सी नमूनों पर किया गया, जिनके धुआंरहित तंबाकू के सेवन का इतिहास था।

नमूने गुवाहाटी के डॉ. भुवनेश्वर बरुआ कैंसर इंस्टीट्यूट के सहयोग से जुटाए गए। NIPER में DNA adductomics का अध्ययन किया गया।

Mass spectrometry से मिले डेटा का विश्लेषण

MutAIverse में मरीज के ट्यूमर बायोप्सी से प्राप्त mass spectrometry डेटा को इनपुट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके आधार पर AI मरीज के संभावित रासायनिक संपर्क की जानकारी तैयार करता है।

Mass spectrometry एक ऐसी तकनीक है, जो कोशिकाओं के नमूनों को आणविक प्रोफाइल में तोड़कर उनका विश्लेषण करने में मदद करती है।

गौरव आहूजा के अनुसार, DNA चार न्यूक्लियोटाइड बेस—A, T, G और C—से बना होता है। शरीर में प्रवेश करने वाला कोई रसायन DNA में बदलाव कर सकता है।

MutAIverse ऐसे बदलावों का विश्लेषण करके संभावित बाहरी संपर्क तक वापस पहुंचने की कोशिश करता है।

AI का आउटपुट संभावित रासायनिक या विषैले पदार्थ के साथ confidence score, क्षतिग्रस्त DNA की संरचना और शरीर में उस विषैले पदार्थ के टूटने से बनने वाले मध्यवर्ती रसायनों की जानकारी भी देता है।

मरीजों को संभावित जोखिम से बचाने में मदद

शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति में तंबाकू उत्पाद या किसी व्यावसायिक रसायन से जुड़े संभावित जोखिम की पहचान होती है, तो वह भविष्य में उस संपर्क से बच सकता है। इसी तरह समान जोखिम वाले अन्य लोगों को भी सावधान किया जा सकता है।

हालांकि, विशेषज्ञों ने तकनीक की सीमाओं पर भी जोर दिया है।

IIT कानपुर के जैविक विज्ञान और बायोइंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर सरवनन मथेश्वरन ने कहा कि DNA adduct की मौजूदगी यह बताती है कि किसी रसायन ने DNA के साथ संपर्क किया है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उसी क्षति ने DNA में ऐसा म्यूटेशन पैदा किया, जिससे अंततः कैंसर हुआ।

कुछ प्रकार की DNA क्षति कोशिकाओं द्वारा ठीक की जा सकती है, जबकि कुछ क्षतियां बनी रह सकती हैं और जीनोमिक अस्थिरता में योगदान दे सकती हैं।

उन्होंने कहा कि AdductLinker की उपयोगिता इस बात में है कि यह DNA adduct और उसे पैदा करने वाले संभावित रासायनिक संपर्क के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। हालांकि इस संबंध को साबित करने के लिए अभी और प्रयोगात्मक, क्लिनिकल और महामारी विज्ञान संबंधी प्रमाण आवश्यक होंगे।

फिलहाल क्लिनिकल डायग्नोस्टिक टूल नहीं

अशोका विश्वविद्यालय के कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट और जीवविज्ञान के प्रोफेसर केदार नटराजन ने कहा कि भारत में सिर और गर्दन के कैंसर के मामलों में, खासकर पूर्वोत्तर क्षेत्र में, धुआंरहित तंबाकू और सुपारी का सेवन प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल है।

उन्होंने कहा कि कैंसर पैदा करने वाले संभावित जोखिम की जानकारी बीमारी की गंभीरता, म्यूटेशन संबंधी स्थिति, कैंसर प्रबंधन और संभावित उपचार रणनीति को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान स्वरूप में GenAI प्लेटफॉर्म एक प्रभावशाली कंप्यूटेशनल रिसर्च टूल है, लेकिन अभी इसे अस्पतालों या समुदायों में इस्तेमाल होने वाले क्लिनिकल डायग्नोस्टिक टूल के रूप में नहीं देखा जा सकता।

विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में पर्याप्त सत्यापन के बाद MutAIverse को जीनोम सीक्वेंसिंग और अन्य तकनीकों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी व्यक्ति में कैंसर किस तरह विकसित हुआ।