मंगल ग्रह पर जीवन संभव या नहीं? भारतीय वैज्ञानिकों की स्टडी ने दुनिया को दिखाई उम्मीद

Posted on: 2026-04-22


नई दिल्ली: भारतीय वैज्ञानिकों के एक शोध ने अंतरिक्ष से जुड़े कुछ उनसुलझे रहस्यों को सुलझाने की दिशा में दुनिया को बड़ी उम्मीद दे दी है। 1975 में 'आर्यभट्ट' उपग्रह की लॉन्चिंग असल में अंतरिक्ष के दरवाजे पर भारत की जोरदार दस्तक थी। उसके बाद से भारत ने अंतरिक्ष में न केवल अपने उपग्रह सफलतापूर्वक लॉन्च किए बल्कि दुनियाभर के कई देशों के उपग्रहों को भी कक्षा में पहुंचाया। फिर 2013 में पहले प्रयास में ही मंगलयान को मंगल की कक्षा में भेजकर यह साबित कर दिया कि अंतरिक्ष विज्ञान में भारत का कोई सानी नहीं है। लेकिन, मंगल पर जीवन है या नहीं? इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है। अब इसी जवाब को तलाशते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैम्पस के सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राम करण और उनके शोध छात्रों शुभम पांडे, अंजलि गुप्ता तथा अश्विनी चौहान ने एक महत्वपूर्ण खोज की है।


अंटार्कटिका की डीप लेक में सूक्ष्म जीव पर शोध

डॉ. राम करण और उनकी टीम का यह शोध अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिका "Frontiers in Microbiology" में अप्रैल 2026 में प्रकाशित हुआ है। डॉ. राम करण और उनकी टीम ने अंटार्कटिका महाद्वीप की डीप लेक में मिलने वाले सूक्ष्मजीव 'हैलोरूबरुम लेकसप्रोफुंडी' पर अपना शोध किया। डीप लेक में दो तरह की दशाएं चरम सीमा पर मिलती हैं। एक तो यह अत्यंत ठंडा स्थल है और दूसरा यह अत्यधिक खारा है। हैलोरूबरुम जैसे सूक्ष्मजीव के लिए ऐसी दशाओं में जीवित रहना किसी अजूबे से कम नहीं है क्योंकि ऐसी दशाएं पृथ्वी पर कहीं और नहीं मिलतीं।

मंगल जैसे ग्रहों पर वैसी ही मौसमी दशाएं उपस्थित हैं जैसी की अंटार्कटिक की डीप लेक में हैं जिनमें हैलोरूबरुम जीवित रहता है। ऐसे में इस सूक्ष्मजीव पर किया गया यह शोध इस बात का पता लगाने में सहायता करेगा कि मंगल या उस जैसे अन्य ग्रहों पर कैसे जिंदा रहा जा सकता है।

मंगल पर जीवन की दिशा में बड़ा कदम

डॉ. राम करण और उनकी टीम को इस शोध में उन प्रोटीनों की मुख्य विशेषताओं का पता चला है जो मंगल और दूसरे चरम सीमा वाले वातावरण में जीवित रहने के लिए जरूरी हैं। टीम ने अंटार्कटिका की चरम दशाओं में जीवित रहने वाले सूक्ष्मजीव 'हैलोरूबरुम' का अध्ययन करते हुए पाया कि साधारण जीवों और हालोआर्किया जीवों की प्रोटीन में छोटे लेकिन महत्वपूर्ण अंतर हैं। ये अंतर ही हालोआर्किया जीवों को इस काबिल बनाते हैं कि वे चरम दशाएं जैसे अत्यधिक लवणता, निर्जलीकरण और अत्यधिक ताप या ठंड को सहन कर सकें। 'हैलोरूबरुम' हालोआर्किया की एक प्रजाति है।

इस शोध की सबसे बड़ी बात यह है कि शोधार्थियों ने 3,000 से अधिक प्रोटीनों की संरचना एक साथ जांची और पाया कि यह अनुकूलन किसी एक-दो प्रोटीन में नहीं बल्कि पूरे प्रोटीन तंत्र (प्रोटीओम) में समन्वित रूप से हुआ है। प्रोटीन में ये अंतर इन जीवों को अत्यधिक ठंड और खारेपन, दोनों दशाओं में जीवित रहने के काबिल बनाते हैं; भले ही तापमान शुद्ध जल के हिमांक बिंदु से काफी कम हो।

हैलोरूबरुम प्रोटीन को समझने में मिली यह सफलता जैवतकनीकी के लिए कई अनूठे एंजाइम और उत्प्रेरकों के निर्माण के लिए भी काम आ सकती है। इस तरह के एंजाइम भविष्य में दवाइयां बनाने में, प्रदूषित क्षेत्रों की जैविक सफाई करने और कम ऊर्जा खर्च कर ईंधन का उत्पादन करने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

अंटार्कटिका की डीप लेक में मंगल जैसी स्थितियां

विज्ञानियों का मानना है कि मंगल ग्रह पर जीवन के पनपने में सहायक वातावरण लगभग वैसा ही है, जैसा अंटार्कटिका की डीप लेक में है। डीप लेक महासागरों के मुकाबले 6 गुना से भी ज्यादा लवणीय है। नासा के विज्ञानियों को ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनसे लगता है कि मंगल पर कभी पानी का बहाव था। मंगल पर तापमान -143 डिग्री से लेकर 27 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। अंटार्कटिक महाद्वीप पर भी तापमान कुछ ऐसा ही है।

यह तो अभी मालूम नहीं है कि मंगल ग्रह के वातावरण में सूक्ष्म जीव उपस्थित हैं या नहीं, लेकिन क्यूरोसिटी रोवर और मार्स रेकनेसां ऑर्बिटर जैसे नासा के अभियान इस बात का पता लगाने का काम कर रहे हैं। इस दिशा में डॉ. राम करण और उनके समूह के कार्य ने विज्ञानियों को एक नया रास्ता दिखाने का कार्य किया है। उम्मीद है कि उनकी खोज पूरी दुनिया के लोगों के काम आएगी।