नई दिल्ली, 13 फ़रवरी । राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि चार फरवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान दिए गए उनके भाषण का एक बड़ा हिस्सा बिना उचित कारण के कार्यवाही से हटा दिया गया।
खरगे ने शून्यकाल के बाद सदन में कहा कि उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत में ही स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति का अभिभाषण राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को उठाने का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है, किंतु कई महत्वपूर्ण विषय उसमें शामिल नहीं होते। इसी संदर्भ में उन्होंने सामाजिक न्याय, संसदीय कार्यप्रणाली और सरकार की नीतियों पर अपने विचार रखे थे।
उन्होंने कहा कि राज्यसभा की वेबसाइट पर अपलोड भाषण के शब्दशः पाठ की समीक्षा करने पर उन्हें पता चला कि उनके भाषण के वे हिस्से हटाए गए हैं, जिनमें उन्होंने वर्तमान सरकार के कार्यकाल में संसदीय कामकाज पर तथ्यात्मक टिप्पणियां की थीं तथा प्रधानमंत्री की कुछ नीतियों की आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष के नाते यह उनका दायित्व है।
खरगे ने अपने पांच दशक से अधिक लंबे संसदीय अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने सदन की मर्यादा, नियमों और परंपराओं का हमेशा पालन किया है तथा उनके वक्तव्य में कोई असंसदीय या मानहानिकारक शब्द नहीं था और न ही नियम 261 का उल्लंघन किया गया था। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 105(1) के तहत सांसदों को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए हटाए गए अंशों को बहाल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे हटाए गए अंशों को जनता के बीच साझा करने को बाध्य होंगे।
इस पर सभापति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि कार्यवाही से हटाए गए हिस्से को सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “आप वरिष्ठ सदस्य हैं, आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? जो भी हिस्सा कार्यवाही से हटा दिया गया है, वह हटा दिया गया है।”
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सभापति के निर्णय पर प्रश्न उठाने की आलोचना करते हुए कहा कि नियम 261 के तहत यदि सभापति की राय में कोई शब्द या वक्तव्य अपमानजनक या असंसदीय हो तो उन्हें हटाने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि सभापति पर प्रधानमंत्री को बचाने का आरोप लगाना नेता प्रतिपक्ष को शोभा नहीं देता।
इस मुद्दे पर विपक्षी सदस्यों ने प्रक्रिया संबंधी प्रश्न उठाने का प्रयास किया, किंतु सभापति ने इसकी अनुमति नहीं दी और प्रश्नकाल की कार्यवाही प्रारंभ कर दी।