भूमकाल आंदोलन: जल, जंगल और जमीन की रक्षा का ऐतिहासिक संघर्ष
देश की आज़ादी और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों ने जिस ऐतिहासिक संघर्ष का शंखनाद किया, वह भूमकाल आंदोलन के नाम से जाना जाता है। भूमकाल का अर्थ है—अपनी भूमि और अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ा गया संघर्ष। इस आंदोलन में बस्तर के हजारों आदिवासियों ने अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजी शासन और शोषक वर्ग के खिलाफ एक संगठित और हिंसात्मक युद्ध लड़ा।
सन 1910 में शुरू हुए इस आंदोलन के दौरान आदिवासियों ने तीर-धनुष और पारंपरिक हथियारों के सहारे अंग्रेजों की आधुनिक बंदूकों का सामना किया। इस संघर्ष में कई आदिवासियों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी, लेकिन उन्होंने अपने अधिकारों की लड़ाई से पीछे हटने से इनकार कर दिया। इस युद्ध ने बस्तर के आदिवासी समाज को भारी नुकसान पहुंचाया, बावजूद इसके आंदोलन ने आदिवासी चेतना को नई दिशा दी।
बस्तर के इतिहासकार डॉ. सतीश जैन बताते हैं कि जब आदिवासियों ने देखा कि उनके जल, जंगल और जमीन शोषक वर्ग और अंग्रेजी हुकूमत के हाथों छीनी जा रही है, तब उन्होंने अंग्रेजों की बेड़ियों को तोड़ने के लिए भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की। भूमकाल का शाब्दिक अर्थ ही अपनी भूमि के लिए संघर्ष करना है, और इस लड़ाई में बस्तर की विभिन्न आदिवासी जातियां एकजुट होकर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ खड़ी हो गईं।
इस आंदोलन के महान नायक शहीद गुंडाधुर माने जाते हैं। धुर्वा समाज के प्रमुख शहीद गुंडाधुर ने आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए लंबा संघर्ष किया और अंततः शहीद हो गए। भूमकाल आंदोलन के दौरान ही बस्तर रियासत के तत्कालीन राजा प्रवीण चंद की भी अंग्रेजों द्वारा हत्या कर दी गई थी, जो उस दौर की क्रूरता को दर्शाता है।
भूमकाल आंदोलन की स्मृति में बस्तर की विभिन्न जनजातियों द्वारा हर वर्ष 10 फरवरी को भूमकाल दिवस या बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन उन वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देने का प्रतीक है, जिन्होंने अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
डॉ. सतीश जैन का कहना है कि आज भी बस्तर के आदिवासी अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। वर्तमान समय में भी बैलाडीला क्षेत्र में अपने इष्ट देवता और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए आदिवासी पारंपरिक हथियारों के साथ धरने पर बैठे हुए हैं। हालांकि, वे यह भी बताते हैं कि तत्कालीन भूमकाल और आज के संघर्षों में परिस्थितियां और तरीके बदल गए हैं, लेकिन आदिवासियों की मूल लड़ाई और संकल्प आज भी वही बना हुआ है।