किसी देश की विदेश नीति को केवल उसके धर्म, धार्मिक प्रतीकों या दो अन्य देशों के साथ उसके संबंधों के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। 1992 में स्थापित जिस देश का जिक्र इस संदर्भ में किया जाता है, उसकी भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक विरासत और क्षेत्रीय राजनीति को भी समझना जरूरी है। किसी देश को केवल तुर्की और पाकिस्तान का सहयोगी मान लेने से भारत के सामने मौजूद संभावित कूटनीतिक और आर्थिक अवसरों का आकलन अधूरा रह सकता है।
यदि यह देश अजरबैजान है, तो उसके मामले में भारत की रणनीति को समझने के लिए कुछ अहम पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है। अजरबैजान ने 1991 में सोवियत संघ से स्वतंत्रता हासिल की और भारत के साथ उसके राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। बाकू के पास स्थित अग्नि मंदिर, जिसे अतिशगाह कहा जाता है, इस क्षेत्र की ऐतिहासिक धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। हालांकि, इस मंदिर की विरासत को केवल हिंदू परंपरा से जोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसका संबंध पारसी और अन्य अग्नि-पूजा परंपराओं से भी रहा है।
अजरबैजान की रणनीतिक अहमियत उसकी भौगोलिक स्थिति से भी जुड़ी है। यह कैस्पियन सागर के पश्चिमी तट पर स्थित है और दक्षिण काकेशस क्षेत्र में यूरोप तथा एशिया के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऊर्जा संसाधनों, तेल-गैस आपूर्ति और परिवहन मार्गों के कारण इसका अंतरराष्ट्रीय महत्व बढ़ जाता है। भारत के लिए यह क्षेत्र मध्य एशिया और यूरोप तक आर्थिक संपर्क मजबूत करने के अवसर उपलब्ध करा सकता है।
दूसरी ओर, अजरबैजान के तुर्की और पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध भारत की कूटनीति के लिए चुनौती भी हैं। तुर्की और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से रक्षा तथा राजनीतिक सहयोग रहा है। अजरबैजान के साथ भी दोनों देशों के संबंध मजबूत हैं। ऐसे समीकरणों का असर भारत के क्षेत्रीय हितों और कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कूटनीतिक रुख पर पड़ सकता है।