विदेश मंत्री ने वैश्विक संघर्षों से आने वाले दिनों में बड़े खाद्य संकट की ओर किया इशारा

Posted on: 2026-09-29


विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने चेतावनी दी है कि चल रहे वैश्विक संघर्षों और उनके कारण अनाज की आपूर्ति तथा उर्वरक उत्पादन में आ रही रुकावटों से आने वाले महीनों में एक बड़ा खाद्य संकट पैदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि इससे विकासशील देशों पर भारी दबाव पड़ेगा। न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में डॉ. एस. जयशंकर ने इन खतरों को ऊर्जा आपूर्ति, अनाज निर्यात, उर्वरक और वैश्विक वित्त में आ रही गंभीर दिक्कतों से सीधे जोड़ा। उन्होंने जोर दिया कि यूक्रेन संघर्ष और ईरान-खाड़ी संकट के गहरे प्रभाव उन देशों की सीमाओं से कहीं आगे तक महसूस किए जा रहे हैं जो सीधे तौर पर इनमें शामिल नहीं हैं।

उर्वरक की भारी कमी और ब्लैक सी कॉरिडोर की दिक्कतें

कृषि क्षेत्र में आ रही रुकावटों की गंभीरता बताते हुए जयशंकर ने कहा, “हम पहले से ही उर्वरक की भारी कमी देख रहे हैं।” उन्होंने बताया कि अनाज निर्यात करने वाले प्रमुख देशों को शिपमेंट भेजने में, खासकर महत्वपूर्ण ब्लैक सी कॉरिडोर के जरिए, भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।हालात की गंभीरता को रेखांकित करते हुए उन्होंने चेतावनी दी, “तो शायद आने वाले महीनों में एक बड़ा खाद्य संकट आ सकता है।” उनकी बातों से स्पष्ट है कि यह स्थिति एक आसन्न प्रणालीगत खतरा है, न कि कोई ऐसा नतीजा जो पहले ही हो चुका हो।

ऊर्जा सुरक्षा और तेल कीमतों का खतरा

ऊर्जा सुरक्षा भी चिंता का बड़ा कारण बनी हुई है। वैश्विक बाजार में तंग स्थिति का जिक्र करते हुए डॉ. एस. जयशंकर ने चेतावनी दी कि तेल आपूर्ति को प्रभावित करने वाले राजनीतिक फैसलों से कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ सकती हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब देशों को मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता की सख्त जरूरत है। उन्होंने आपूर्ति सुरक्षा और भू-राजनीतिक हस्तक्षेप को आपस में गहराई से जुड़े दबाव बताया।

ग्लोबल साउथ से पूंजी का पलायन और वित्तीय दबाव

इसके असर महंगाई बढ़ने तक ही सीमित नहीं हैं। डॉ. एस. जयशंकर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष स्वाभाविक रूप से पूंजी को सुरक्षित वित्तीय ठिकानों की ओर ले जाते हैं, जिससे ‘ग्लोबल साउथ’ से निवेश तेजी से बाहर निकल जाता है। जो देश एक साथ भोजन, ईंधन, उर्वरक और वित्त के मोर्चे पर झटकों का सामना कर रहे हैं, उनके पास आगे की अस्थिरता को झेलने के लिए बहुत कम वित्तीय गुंजाइश बची है।

“देशों को आत्म-केंद्रित नहीं होना चाहिए”

अलग-थलग रहकर नीति बनाने के खिलाफ तर्क देते हुए डॉ. एस. जयशंकर ने कहा कि वैश्विक नेता दूसरे देशों को होने वाले आर्थिक नुकसान को अनजाने में हुआ नुकसान कहकर खारिज नहीं कर सकते। नीति-निर्माताओं की बुनियादी जिम्मेदारी है कि वे अपने एकतरफा फैसलों के व्यापक, सीमा-पार असर पर विचार करें। स्वार्थ-केंद्रित नीतिगत दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए उन्होंने कहा, “देशों को इतना आत्म-केंद्रित नहीं होना चाहिए कि वे अपनी ही दुनिया में रहें और फैसले लें।” उन्होंने जोर दिया कि नेताओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके घरेलू फैसलों का दूसरी जगहों की आबादी पर क्या असर पड़ता है, खासकर उन इलाकों में जहां संसाधन कम हैं और प्रतिक्रिया देने की क्षमता सीमित है।

विकासशील देशों को आर्थिक संकट से बचाने की जरूरत

विदेश मंत्री ने कमजोर विकासशील देशों को गहरे आर्थिक संकट में जाने से बचाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने याद दिलाया कि इतिहास गवाह है कि जब शासन-व्यवस्था चरमराती है, तो वैश्विक सुरक्षा पर भारी कीमत चुकानी पड़ती है। इसलिए बुनियादी जरूरतें पूरी करना आम समझ और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का मामला बन जाता है। उन्होंने कहा कि एक उपनिवेश-बाद के समाज के तौर पर भारत का विकासशील दुनिया के संघर्षों से गहरा जुड़ाव है। हालांकि, अमीर औद्योगिक देशों का भी व्यापक अस्थिरता को रोकने में व्यावहारिक और अपना हित है। उन्होंने खास तौर पर यूक्रेन युद्ध के बाद भारत के पड़ोसी देशों में आर्थिक संकट के कारण हुए राजनीतिक असर का जिक्र किया।

चार एफ का जुड़ा संकट और एसडीजी में देरी

अपनी शुरुआती बातों में डॉ. एस. जयशंकर ने भोजन, ईंधन, उर्वरक और वित्त को चार हिस्सों वाला एक-दूसरे से जुड़ा संकट बताया, जो इस समय दुनिया के बड़े हिस्से में अस्थिरता पैदा कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की दिशा में ठोस प्रगति तय समय से काफी पीछे चल रही है। इन लक्ष्यों को 2015 में गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास से जुड़ी प्राथमिकताओं को 2030 तक हल करने के लिए अपनाया गया था। इस देरी से उन देशों के लिए मुश्किलें और बढ़ रही हैं जो पहले से ही सक्रिय संघर्ष और सप्लाई चेन में रुकावटों का सामना कर रहे हैं।जयशंकर ने ये बातें उस व्यापक चर्चा के दौरान कहीं, जिसमें उन देशों के सामने आने वाली गंभीर चुनौतियों पर बात हो रही थी जो बड़ी ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बावजूद अपनी कूटनीतिक आजादी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।