Make in India : पिछले 12 वर्षों में, मेक इन इंडिया विजन के तहत साहसिक सुधारों ने उद्योगों को नया आकार दिया

Posted on: 2026-09-25


आज ‘मेक इन इंडिया’ पहल के 12 साल पूरे हो रहे हैं। भारत सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग, डिज़ाइन और इनोवेशन के लिए एक ग्लोबल हब बनने के मकसद से यह पहल शुरू की थी। इस पहल ने अलग-अलग इंडस्ट्रीज़ में प्रोडक्शन, इन्वेस्टमेंट और क्षमताओं को बढ़ाकर भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की तस्वीर बदल दी है।


मेक इन इंडिया की आवश्यकता


‘मेक इन इंडिया’ पहल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितंबर 2014 में देश के विकास से जुड़ी कई पहलों के हिस्से के तौर पर शुरू किया था। भारत को डिज़ाइन और मैन्युफैक्चरिंग का ग्लोबल हब बनाने के मकसद से शुरू की गई ‘मेक इन इंडिया’ पहल, एक अहम स्थिति में उठाया गया सही समय का कदम था। दरअसल, वर्ष 2013 तक, भारत की विकास दर एक दशक में अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई थी। इस वक्त ब्रिक्स देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका) से जुड़ी उम्मीदें कम हो गई थीं और भारत को तथाकथित ”फ्रेजाइल फाइव’ (कमज़ोर पांच देशों) में से एक माना जाने लगा था। ‘फ्रेजाइल फाइव’ (Fragile Five) दुनिया की पांच ऐसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक वित्तीय शब्द है, जो विदेशी निवेश पर अत्यधिक निर्भर थीं और बाहरी आर्थिक झटकों के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील मानी जाती थीं।


ग्लोबल निवेशकों ने इस बात पर बहस की कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक जोखिम है या एक अवसर। वहीं, भारत के नागरिकों ने सवाल उठाया कि क्या भारत सफल होने के लिए बहुत बड़ा है या विफल होने के लिए बहुत बड़ा है। भारत गंभीर आर्थिक विफलता के कगार पर था और उसे जबरदस्त बढ़ावा देने की सख्त जरूरत थी। राष्ट्र को आर्थिक क्षेत्र की प्रगति में कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसी स्थिति में भारत को डिजाइन और विनिर्माण के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र में बदलने के लिए, “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम की शुरुआत की गयी।


मेक इन इंडिया विजन के तहत साहसिक सुधारों ने उद्योगों को नया आकार दिया


पिछले 12 वर्षों में, मेक इन इंडिया विजन के तहत साहसिक सुधारों ने उद्योगों को नया आकार दिया है, जिससे देश एक वैश्विक हब के रूप में स्थापित हो गया है। रक्षा उपकरण, वस्‍त्र, फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरण और भारी मशीनरी अब विश्व स्तरीय मानकों पर उत्पादित की जाती हैं, जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में मांग की पूर्ति‍ करते हैं। इस गति को और तेज करने के लिए, सरकार ने उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, पीएम गतिशक्ति, राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति, भव्य और इलेक्ट्रॉनिक्स और एमएसएमई सेक्‍टरों के लिए जैसी कई पहल शुरू की हैं।


भारत के विनिर्माण इकोसिस्टम का सुदृढ़ीकरण


विनिर्माण क्षेत्र अब सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 16-17 प्रतिशत का योगदान देता है और 27 मिलियन से अधिक श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है। 2022-23 से 2025-26 के दौरान संशोधित श्रृंखला के अनुसार स्थिर कीमतों (2022-23 आधार) पर विनिर्माण जीवीए की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) 10.88 प्रतिशत है। जुलाई 2026 में व्यापारिक निर्यात 44.24 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जबकि एक साल पहले यह 36.98 बिलियन डॉलर था। जून 2026 में विनिर्माण उत्पादन में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ये संकेतक विनिर्माण को भारत के आर्थिक विकास के केंद्रीय चालक के रूप में दर्शाते हैं।


भारत का रक्षा रूपांतरण: आत्मनिर्भरता से वैश्विक निर्यात तक


महत्वपूर्ण तथ्य-


स्वदेशी रक्षा उत्पादन का मूल्य वित्त वर्ष 2025–26 में रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ पर पहुंच गया। यह पिछले वित्त वर्ष के ₹1,54,071 करोड़ की तुलना में 15.6% की वृद्धि है, जबकि 2014–15 में यह ₹46,429 करोड़ था।

रक्षा निर्यात 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये हो गया।

भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों में निर्यात किए जाते हैं, जो पिछले बारह वर्षों में 5,500 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्शाते हैं।

रक्षा पीएसयू और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल उत्पादन में लगभग 76 प्रतिशत का योगदान दिया। निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर 24 प्रतिशत हो गई, जो उद्योग की अधिक भागीदारी को दर्शाती है।

मई 2026 तक, 5,521 मदों को कवर करते हुए डीएमए और डीडीपी की पांच-पांच सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों को अधिसूचित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ी।

सृजन डिफेंस इक्विपमेंट एम्पावरमेंट प्लेटफॉर्म (डीईईपी) स्वदेशी रक्षा सोर्सिंग को बढ़ावा देने वाला एक डिजिटल रिपॉजिटरी है। मई 2026 तक, इसने 41,000 से अधिक विक्रेताओं और 2.7 लाख उत्पादों को सूचीबद्ध किया, जिससे घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाएं सुदृढ़ हुईं।

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स को बढ़ावा


आज भारत तेजी से इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ है, जिसने उत्पादन और निर्यात दोनों में असाधारण वृद्धि हासिल की है। इलेक्ट्रॉनिक्स पर राष्ट्रीय नीति, स्पेक्स, ईएमसी 2.0 और पीएलआई जैसी लगातार नीतियों ने इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को नया आकार दिया है। इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ईसीएमएस) जैसी योजनाओं ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिजाइन एंड मैन्युफैक्चरिंग (ईएसडीएम) इकोसिस्टम को और मजबूत किया, जिससे विकास और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा मिला। इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन वित्त वर्ष 2024-25 के 11.32 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो वर्ष-दर-वर्ष 15.8 प्रतिशत की वृद्धि है।


सेमीकॉन विनिर्माण


सेमीकंडक्टर गंतव्य के रूप में भारत का उदय इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में निरंतर सुधारों पर आधारित है। सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम (सेमीकॉन 1.0) को दिसंबर 2021 में 76,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया था। इसे घरेलू सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम बनाने के लिए लॉन्च किया गया था। इसके आधार पर, सेमीकॉन 2.0 को जुलाई, 2026 में 1,27,500 करोड़ रुपये के कुल बजट परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया है।


सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम 1.0 के तहत प्रगति


भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर क्षेत्र एक नए और महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर रहा है। बड़े पैमाने पर निवेश आ रहे हैं, विनिर्माण क्षमताओं का विस्तार हो रहा है और वैश्विक कंपनियां भारत में अपनी उपस्थिति बढ़ा रही हैं। इसके साथ ही, इकोसिस्‍टम अभूतपूर्व गति से विकसित हो रहा है। जैसे-जैसे उद्योग का विस्तार हो रहा है, उद्योग जगत के नेता अलग-अलग क्षेत्रों की क्षमताओं को एक सामूहिक राष्ट्रीय क्षमता में बदलने के लिए उद्योग निकायों के बीच अधिक मजबूत और समन्वित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।


जुलाई 2026 तक, 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के साथ बारह विनिर्माण इकाइयों को मंजूरी दी गई है। इनमें एक सिलिकॉन फैब, एक सिलिकॉन कार्बाइड फैब, एक एकीकृत गैलियम नाइट्राइड माइक्रो एलईडी डिस्प्ले फैब और नौ पैकेजिंग इकाइयां शामिल हैं। साथ में, उनसे उपभोक्ता उपकरणों, औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार और एयरोस्पेस में चिप आवश्यकताओं को पूरा करने की उम्मीद है।


सरकार ने सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के तहत 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिनमें से सितम्‍बर 2026 तक पांच वाणिज्यिक सेमीकंडक्टर इकाइयां पहले ही परिचालन में आ चुकी हैं।


भारत में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में वृद्धि


भारत का मोबाइल विनिर्माण क्षेत्र तेजी से बढ़ा है, जिससे घरेलू उत्पादन, निर्यात और मूल्यवर्धन सुदृढ़ हुआ है।

भारत में उपयोग किए जाने वाले 99.2 प्रतिशत मोबाइल फोन अब घरेलू स्तर पर बनाए जाते हैं।

भारत मात्रा के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है।

भारत 2014 के बाद से मोबाइल फोन के शुद्ध आयातक से शुद्ध निर्यातक बन गया है।

स्मार्टफोन वित्त वर्ष 2025-26 में पेट्रोलियम, रत्न और आभूषणों को पीछे छोड़ते हुए भारत की निर्यात की जाने वाली शीर्ष एकल वस्तु बन गई।

भारत की फार्मा बढ़त: विनिर्माण और निर्यात में वृद्धि


वैश्विक फार्मास्युटिकल उद्योग में भारत मात्रा में तीसरे और मूल्य में 11वें स्थान पर है। यह दुनिया की 20 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं और टीकों के एक बड़े हिस्से की आपूर्ति करके विश्‍व भर में किफायती स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उत्पादन, निर्यात और घरेलू नवाचार में लगातार वृद्धि ने एक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की स्थिति मजबूत की है।


वस्त्र और परिधान में वृद्धि: वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता का निर्माण


भारत का वस्‍त्र और परिधान उद्योग इसके सबसे महत्वपूर्ण विनिर्माण सेक्‍टरों में से एक है। यह कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है, जो 45 मिलियन से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है और एमएसएमई के नेतृत्व वाले औद्योगिक विकास में सहायता करता है।

वस्‍त्र और परिधान राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में ~2 प्रतिशत, विनिर्माण जीवीए में 11 प्रतिशत और व्यापारिक निर्यात में 9 प्रतिशत का योगदान करते हैं।

वित्त वर्ष 2025 में, भारत ने 37.7 बिलियन डॉलर मूल्य के कपड़ा उत्पादों का निर्यात किया। यह वैश्विक वस्‍त्र और परिधान निर्यात का 4.1 प्रतिशत हिस्सा है, जिससे यह वैश्विक स्तर पर छठा सबसे बड़ा वस्‍त्र निर्यातक बन गया है।

इसके अलावा, वस्त्रों के लिए पीएलआई योजना, पीएम मित्र पार्क, राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन, वस्‍त्र निर्यात संवर्धन मिशन, राष्ट्रीय फाइबर मिशन और हाल ही में घोषित कपास उत्पादकता मिशन जैसी सरकारी पहलों से विनिर्माण क्षमताओं को और मजबूती मिलने और सेक्‍टर की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होने की संभावना है।


भारत की समुद्री बढ़त: जहाज और कंटेनर का निर्माण -घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए समुद्री सेक्‍टर में कई पहल शुरू की गई हैं। सितंबर, 2025 में, घरेलू जहाज निर्माण क्षमता, समुद्री वित्तपोषण और कौशल को मजबूत करने के लिए 69,725 करोड़ रुपये के व्यापक पैकेज की घोषणा की गई थी।


ऑटोमोबाइल: विनिर्माण शक्ति


भारत में एक मजबूत ऑटोमोबाइल उद्योग है, जो व्यापक विनिर्माण क्षमताओं और एक बड़े ऑटो-कंपोनेंट इकोसिस्टम द्वारा समर्थित है। यह दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और वैश्विक स्तर पर यात्री और वाणिज्यिक वाहनों के लिए तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। यह सेक्‍टर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को भी आगे बढ़ा रहा है, जिसे ईवी अंगीकरण अपनाने और सरकारी पहलों का समर्थन प्राप्त है। यह सेक्‍टर पूरे भारत में 30 मिलियन से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। वाहन उत्पादन वित्‍त वर्ष 2021 में 22.65 मिलियन यूनिट से बढ़कर वित्‍त वर्ष 2025 में 31.03 मिलियन यूनिट हो गया। वित्‍त वर्ष 2015 और वित्‍त वर्ष 2025 के बीच कुल उत्पादन लगभग 33 प्रतिशत बढ़ गया।


भारत के पीवी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का तेजी से विस्तार


भारत के सोलर पीवी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का तेजी से विस्तार हुआ है, जिससे सोलर सेल और मॉड्यूल का घरेलू उत्पादन मजबूत हुआ है। घरेलू पीवी बाजार का मूल्य लगभग 32,400 करोड़ रुपये है और 2030 तक इसके मजबूती से बढ़ने की उम्मीद है।

घरेलू पीवी बाजार के वित्‍त वर्ष 2023 और वित्‍त वर्ष 2030 के बीच 17–20 प्रतिशत सीएजीआर से बढ़ने की उम्मीद है।

मॉडल और विनिर्माताओं की स्वीकृत सूची (एएलएमएम) सूचीबद्ध सौर मॉड्यूल क्षमता अगस्त 2025 में 100 गीगावॉट तक पहुंच गई। यह 2014 के लगभग 2.3 गीगावॉट की तुलना में तेजी से बढ़ा।

मार्च 2025 में सौर सेल विनिर्माण क्षमता 25 गीगावॉट तक पहुंच गई। यह क्षमता 2014 में 1.2 गीगावॉट से कम थी।

सरकार ने उच्च दक्षता वाले सौर पीवी मॉड्यूल विनिर्माण के लिए पीएलआई योजना शुरू की। इस योजना में 24,000 करोड़ रुपये की कुल फंडिंग के साथ दो किश्तें हैं और 48 गीगावॉट एकीकृत पीवी क्षमता प्रदान की गई है।

वित्‍त वर्ष 2025 में पीवी निर्यात वित्‍त वर्ष 2018 की तुलना में आठ गुना अधिक था। पीएलआई योजना के तहत उच्च सेल-टू-मॉड्यूल क्षमता ने इस वृद्धि में सहायता की।

इसके अतिरिक्त, FDI के लिए कई सेक्टर खोले गए हैं, जैसे डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, रेलवे, स्पेस, सिंगल ब्रांड रिटेल वगैरह। साथ ही, ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ (कारोबार में आसानी) के लिए रेगुलेटरी पॉलिसी में ढील दी गई है ताकि ज़्यादा इन्वेस्टमेंट हो सके। देश के अलग-अलग इलाकों में छह इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं। इन कॉरिडोर्स के साथ-साथ इंडस्ट्रियल शहर भी बसाए जाएंगे। आज भारत की साख पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत है। एक साफ़ तेज़ी, ऊर्जा और उम्मीद दिखाई दे रही हैं।


उल्लेखनीय है कि ‘मेक इन इंडिया’ से इन्वेस्टमेंट के नए रास्ते खुल रहे हैं। कई कंपनियां इसके मंत्र को अपना रही हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, दुनिया की सबसे ताकतवर इकॉनमी बनने की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।