कुछ कहानियों का असर उनके ट्विस्ट में नहीं, बल्कि उस भावना में होता है जिससे वे शुरू होती हैं। अपने बच्चे से बिछड़ने का दर्द ऐसी ही भावनाओं में शामिल है।
‘शक: ट्रस्ट नो वन’ इसी बेहद संवेदनशील स्थिति को एक रहस्य और अपराध की कहानी में बदलने की कोशिश करती है। रेंसिल डिसिल्वा के निर्देशन में बनी यह सीरीज एक ऐसी मां की कहानी सामने लाती है, जो अपनी बेटी को खोने के सालों बाद भी यह मानने के लिए तैयार नहीं है
कि वह अब इस दुनिया में नहीं है। उसके लिए बीता हुआ वक्त इस उम्मीद को खत्म नहीं कर पाया है कि एक दिन उसकी बेटी उसके सामने वापस होगी। यहीं से सीरीज का सबसे दिलचस्प सवाल पैदा होता है। क्या उसकी उम्मीद किसी सच्चाई पर टिकी है
या लंबे समय से चले आ रहे सदमे ने उसकी सोच को प्रभावित करना शुरू कर दिया है? ‘शक’ की शुरुआत इस सवाल को अच्छे तरीके से स्थापित करती है।
शुरुआती एपिसोड में रहस्य पैदा होता है, किरदारों पर शक करने की वजह मिलती है और लगता है कि कहानी आगे चलकर कई दिलचस्प परतें खोलेगी। समस्या तब शुरू होती है, जब सीरीज इस मूल कहानी के आसपास जरूरत से ज्यादा चीजें जोड़ने लगती है।
सीरीज की कहानी शिमला में रहने वाली अन्विता के इर्द-गिर्द घूमती है। कई साल पहले अस्पताल से उसकी नवजात बेटी रहस्यमय तरीके से गायब हो जाती है। उस वक्त जांच होती है, लेकिन बच्ची का कोई सुराग नहीं मिलता। समय बीतता जाता है,
परिवार अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश करता है, लेकिन अन्विता उस घटना को पीछे छोड़ नहीं पाती। वह अपनी बेटी को मृत मानने के लिए तैयार नहीं है। उसकी इस उम्मीद को और हवा तब मिलती है, जब हर साल बेटी के जन्मदिन के आसपास उसे एक रहस्यमय तस्वीर मिलती है। यहीं से उसकी तलाश फिर तेज हो जाती है।
कहानी में उसके पति, परिवार, दोस्त और आसपास के नए लोगों की एंट्री होती है। हर किरदार के साथ कोई न कोई ऐसा पहलू जुड़ा है, जो उसे संदेह के घेरे में ला सकता है। इसी बीच अन्विता की मुलाकात एक ऐसे परिवार से होती है, जिसकी बेटी की उम्र वही है, जितनी उसकी खोई हुई बच्ची की होती।
इसके बाद कहानी एक नए सवाल की तरफ बढ़ती है। क्या अन्विता की तलाश आखिरकार सही जगह पहुंची है या वह अपनी उम्मीद और डर के बीच फर्क नहीं कर पा रही? यहां तक कहानी का आधार काफी मजबूत है। एक मां, सालों पुराना रहस्य और एक बच्ची जिसकी पहचान पर सवाल है,
इन चीजों से एक शानदार थ्रिलर बनाई जा सकती थी। लेकिन सीरीज इसी मूल विचार पर भरोसा करने के बजाय लगातार नए ट्रैक जोड़ती रहती है। अवैध सरोगेसी, रिश्तों में धोखा, पारिवारिक तनाव, काले जादू, मानसिक भ्रम और कई दूसरे रहस्य कहानी में शामिल होते जाते हैं।
इनमें से कुछ चीजें अपने आप में दिलचस्प हैं, लेकिन एक साथ आने पर मुख्य कहानी की पकड़ ढीली पड़ जाती है। सीरीज का सबसे बड़ा नुकसान यही है कि दर्शक जिस एक सवाल का जवाब जानना चाहता है, उसके बजाय उसे कई दूसरे सवालों के पीछे भेज दिया जाता है।
‘शक’ की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह दर्शक से लगातार अनुमान लगाने की उम्मीद करती है, लेकिन इसके संकेत कई जगह इतने स्पष्ट हो जाते हैं कि कहानी की दिशा पहले ही समझ आने लगती है। एक अच्छे मिस्ट्री शो में दर्शक को हर नए सुराग के बाद अपनी थ्योरी बदलनी चाहिए। यहां कुछ मौकों पर ऐसा होता जरूर है,
लेकिन कई जगह रेड हेरिंग इतनी स्पष्ट दिखाई देती है कि उसका मकसद समझ में आने लगता है। सीरीज में डीएनए टेस्ट का इस्तेमाल भी बार-बार कहानी को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है। शुरुआत में यह एक महत्वपूर्ण जांच उपकरण लगता है, लेकिन लगातार इसी तरह के समाधान सामने आने से इसका प्रभाव कम होता जाता है।
कुछ घटनाओं में किरदार ऐसे राज भी जल्दी खोल देते हैं, जिन्हें छिपाकर रखने की कोई ठोस वजह या फिर अचानक सामने लाने का पर्याप्त नाटकीय आधार नहीं दिया गया है। इससे रहस्य स्वाभाविक तरीके से खुलने के बजाय पटकथा की जरूरत के हिसाब से खुलता हुआ महसूस होता है। यही वजह है कि आखिरी एपिसोड तक पहुंचते-पहुंचते रोमांच की जगह यह जानने की उत्सुकता ज्यादा रह जाती है कि कहानी को आखिर किस निष्कर्ष तक पहुंचाया जाएगा।
रेंसिल डिसिल्वा ने इससे पहले क्राइम और ड्रामा की दुनिया में अपना काम दिखाया है। ‘शक’ में भी उनका उद्देश्य साफ दिखाई देता है। वह माहौल को रहस्यमय रखना चाहते हैं और दर्शक को किसी भी किरदार पर पूरी तरह भरोसा नहीं करने देना चाहते, लेकिन निर्देशन को सबसे ज्यादा नुकसान स्क्रीनप्ले की अधिकता से होता है।
कहानी को सात एपिसोड में फैलाने के लिए लगातार नए मोड़ और सब-प्लॉट जोड़े गए हैं। अगर इसी कहानी को ज्यादा कसा हुआ रखा जाता और मां-बेटी के रिश्ते तथा जांच पर मुख्य फोकस रहता, तो भावनात्मक असर कहीं ज्यादा मजबूत हो सकता था।
कुछ दृश्यों में थ्रिल पैदा करने के लिए लाइटिंग, विजुअल इफेक्ट और भ्रम वाले सीक्वेंस का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन ये चीजें कहानी से स्वाभाविक रूप से निकलने के बजाय कई बार दर्शक को यह बताती हुई लगती हैं कि अब आपको डरना या सस्पेंस महसूस करना है। यानी थ्रिल पैदा होने के बजाय थ्रिलर वाला ट्रीटमेंट नजर आने लगता है।
सबसे ज्यादा निराशा इस बात से होती है कि कहानी के पास खुद में पर्याप्त दम था। इसे हर कुछ मिनट में नया रहस्य देने की जरूरत नहीं थी। एक मां की नौ साल लंबी तलाश ही दर्शक को बांधे रखने के लिए काफी मजबूत आधार हो सकती थी।
सीरीज की लोकेशन इसकी खूबसूरत खूबियों में शामिल है। शिमला का मौसम, पहाड़, धुंध और सुनसान रास्ते एक मिस्ट्री सीरीज के लिए बेहतरीन वातावरण बना सकते थे, लेकिन कैमरा शिमला की खूबसूरती तो दिखाता है, उस माहौल को कहानी के तनाव में बदल नहीं पाता।
लोकेशन ज्यादातर बैकग्राउंड में रहती है। एक बेहतर ट्रीटमेंट में यही पहाड़ी वातावरण अकेलेपन, डर और अनिश्चितता को कहानी का हिस्सा बना सकता था। यहां शिमला कई बार सिर्फ एक खूबसूरत लोकेशन जैसा दिखाई देता है।
परिणीति चोपड़ा के लिए अन्विता का किरदार आसान नहीं है। इसमें मां का दर्द, गुस्सा, बेचैनी, उम्मीद और मानसिक अस्थिरता जैसे कई भावों को साथ लेकर चलना है। परिणीति कुछ दृश्यों में इस भावनात्मक टूटन को अच्छी तरह पकड़ती हैं। खासकर जब किरदार अपनी बेटी की तलाश में बेचैन दिखाई देता है, तब अभिनेत्री की कोशिश नजर आती है।
लेकिन समस्या यह है कि अन्विता को ज्यादातर समय एक ही तरह की तीव्रता में लिखा गया है। इससे उसके दुख, डर और गुस्से के बीच अंतर कई बार धुंधला पड़ जाता है। ताहिर राज भसीन को एक ऐसा किरदार मिला है, जिसमें ग्रे शेड्स हैं। अभिनेता उसमें रहस्य और असहजता पैदा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन किरदार को स्क्रीनप्ले से पर्याप्त गहराई नहीं मिलती।
जेनिफर विंगेट इस पूरी कास्ट में एक अलग सहजता लेकर आती हैं। उनके किरदार में कई परतें हैं और अभिनेत्री उन अलग-अलग रंगों को संभालने में सक्षम दिखाई देती हैं। उनके दृश्यों में एक स्वाभाविकता है, जो कई बार सीरीज के भारी-भरकम ट्रीटमेंट से राहत देती है।
सोनी राजदान को भी ऐसा किरदार मिला है, जिसके जरिए कहानी में एक अलग तरह का तनाव पैदा होता है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस प्रभावशाली है, हालांकि किरदार को और विस्तार दिया जाता तो उनका प्रदर्शन ज्यादा असर छोड़ सकता था।
हरलीन सेठी अपने हिस्से के भावनात्मक और नकारात्मक शेड्स को ठीक तरह से निभाती हैं। सुमीत व्यास सीमित स्क्रीन टाइम में भी अपनी छाप छोड़ते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव अनूप सोनी छोड़ते हैं। पुलिस अधिकारी खुराना के किरदार में वह अनुभवी जांच अधिकारी की थकान और इस पुराने केस से जुड़े जुनून को विश्वसनीय बनाते हैं। उनका किरदार कई जगह सीरीज को जमीन से जोड़ता है।
सबसे पहले बात आती है लंबाई और पेसिंग की। सात एपिसोड में कहानी को बनाए रखने के लिए जिस तरह कई ट्रैक जोड़े गए हैं, वे कई बार मुख्य रहस्य से ध्यान हटा देते हैं। दूसरी बड़ी समस्या पूर्वानुमानित ट्विस्ट हैं। सीरीज लगातार दर्शक को चौंकाना चाहती है, लेकिन कुछ सुराग और संदिग्ध इतने स्पष्ट तरीके से पेश किए जाते हैं
कि उनके पीछे की दिशा समझ में आने लगती है। तीसरी समस्या भावनात्मक गहराई की है। एक मां जिसने अपनी नवजात बच्ची को खोया है और वर्षों तक उसकी तलाश की है, उसके दर्द का असर दर्शक पर ज्यादा गहरा होना चाहिए था। सीरीज इस भावना को बताती ज्यादा है, महसूस कम कराती है। इसके अलावा कुछ पुलिस और जांच से जुड़े फैसले भी सुविधाजनक लगते हैं।
कई अहम जानकारियां उस वक्त सामने आती हैं, जब पटकथा को अगले मोड़ पर जाना होता है। इससे जांच की विश्वसनीयता प्रभावित होती है और सबसे अहम बात सीरीज अपने नाम के मुताबिक हर किसी पर शक करवाना चाहती है, लेकिन हर किरदार को पर्याप्त मजबूत मोटिव या बैकग्राउंड नहीं मिल पाता। परिणाम यह होता है कि शक तो पैदा होता है, लेकिन हर बार जिज्ञासा नहीं।
‘शक: ट्रस्ट नो वन’ के पास एक मजबूत और भावनात्मक कहानी का आधार था। एक मां का अपनी खोई हुई बेटी को वर्षों बाद भी तलाशना अपने आप में ऐसा विषय है, जिससे एक बेहद असरदार क्राइम थ्रिलर बनाई जा सकती थी। सीरीज की शुरुआत उम्मीद जगाती है और कुछ कलाकारों का काम भी अच्छा है। परिणीति चोपड़ा पूरी कोशिश करती हैं,
जेनिफर विंगेट अपने किरदार में सहजता लाती हैं और अनूप सोनी सबसे भरोसेमंद प्रदर्शन देते हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा सब-प्लॉट, सुविधाजनक स्क्रीनप्ले, कुछ आसानी से समझ आने वाले ट्विस्ट और असमान गति इसकी पकड़ कमजोर कर देते हैं।
शिमला जैसी शानदार लोकेशन भी उस स्तर का माहौल नहीं बना पाती, जिसकी एक मिस्ट्री सीरीज से उम्मीद की जाती है। सबसे बड़ी कमी यही लगती है कि कहानी में मौजूद मूल भावनात्मक ताकत पर पूरा भरोसा नहीं किया गया।
इसे ज्यादा कसाव, कम मोड़ और ज्यादा भावनात्मक गहराई की जरूरत थी। ‘शक: ट्रस्ट नो वन’ में एक अच्छी मिस्ट्री का बीज जरूर है, लेकिन उसे सात एपिसोड तक फैलाते हुए कहानी कई दिशाओं में बिखर जाती है। अगर आप धीमे-धीमे खुलने वाली क्राइम मिस्ट्री और पारिवारिक ड्रामा देखना पसंद करते हैं तो इसे आजमा सकते हैं, लेकिन इससे बहुत ज्यादा थ्रिल की उम्मीद न रखें।