बिलासपुर । छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शादी का भरोसा देकर बनाए गए शारीरिक संबंध से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि दो बालिगों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध रहे हों, तो केवल बाद में शादी से इनकार कर देने मात्र से रेप का अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए महिला की अपील को प्रारंभिक सुनवाई (एडमिशन स्टेज) में ही खारिज कर दिया।
मामले के अनुसार, वर्ष 2019 में 40 वर्षीय महिला ने आईआईएम रायपुर में एमबीए में प्रवेश लिया था। इसी दौरान उसकी पहचान एक सहपाठी युवक से हुई और दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। महिला का आरोप था कि 5 जुलाई 2019 को युवक ने ग्रुप स्टडी के बहाने उसे अपने घर बुलाया, जहां शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद दोनों लंबे समय तक रिलेशनशिप में रहे।
महिला ने आरोप लगाया कि जब भी वह शादी की बात करती, युवक उसे टाल देता था। अगस्त 2021 में युवक ने बताया कि महिला के तलाकशुदा होने और ईसाई समुदाय से होने के कारण उसके माता-पिता इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बावजूद वह शादी का आश्वासन देता रहा। बाद में महिला ने महिला आयोग और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर आरोपी के खिलाफ चालान पेश किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि दोनों पक्ष बालिग थे और लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध में रहे। ऐसे में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। इस फैसले को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान समय में महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने में सक्षम हैं। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक सहमति से चले संबंधों को केवल शादी नहीं होने के आधार पर रेप नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में संबंधों की अवधि, दोनों पक्षों के व्यवहार और परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या हस्तक्षेप योग्य कमी नहीं है। इसी आधार पर महिला की अपील को एडमिशन स्टेज पर ही खारिज कर दिया।