आज की जीवनशैली ऐसी है कि खाने का सही समय निकाल पाना बहुत मुश्किल है। आयुर्वेद के हिसाब से खाना सूर्य की स्थिति के मुताबिक खाना चाहिए। सूर्य के तेज के हिसाब से हमारी पाचन अग्नि काम करती है और खाने को पचाने में मदद करती है, लेकिन आज हम प्राकृतिक तरीके से नहीं बल्कि अपनी दिनचर्या के हिसाब से खाते हैं। सोने के वक्त खाते हैं और खाते वक्त सोते हैं, लेकिन क्या यह सही तरीका है? नहीं, आयुर्वेद में देर रात खाना खाना सबसे हानिकारक माना गया है, क्योंकि यह पोषण नहीं, बीमारी देता है। हमें लगता है कि खाना कभी भी खाया जा सकता है, जो शरीर को पोषण ही देगा, लेकिन यह गलतफहमी है।
रात को खाया गया थोड़ा सा भी खाना सिर्फ शरीर को बीमार करता है। रात के वक्त खाना खाने से पेट में भारीपन, सुस्ती, आलस, गैस बनना, ठीक से नींद न आना और सुबह ठीक से पेट साफ न हो पाना शामिल है। ऐसा इसलिए क्योंकि रात को हमारी पाचन अग्नि कमजोर होती है और शरीर मरम्मत का काम कर रहा होता है। ऐसे में खाना खाने से शरीर मरम्मत का काम छोड़कर पूरी ऊर्जा खाने को पचाने में लगा देता है।
मंद पाचन रात के समय ठीक से खाना भी नहीं पचा पाता और यही कारण है कि सुबह पेट भारी महसूस होता है और गैस और बदहजमी जैसी परेशानियां होने लगती हैं। शरीर में खाना पचने की बजाय टॉक्सिन बनने लगते हैं और आंतों में गंदगी जमा होने लगती है। आम (टॉक्सिन) जमने से शरीर सुस्त और कमजोर महसूस करता है और पूरे दिन ऊर्जा महसूस नहीं होती। अब सवाल है कि कब और कितना खाए। अगर शरीर और पाचन को स्वस्थ रखना है तो सूर्य के हिसाब से खाना शुरू करें।
कोशिश करें कि सूरज ढलने के बाद खाना न खाए। अगर खाना है तो रात का भोजन 7–8 बजे तक कर लें। इसके साथ ही भोजन हल्का और कम तैलीय होना चाहिए, जिससे पचाने में पेट को ज्यादा मेहनत न करनी पड़े। आयुर्वेद के मुताबिक खाना खाने के बाद लेटे नहीं, टहलें। अगर टहलने में परेशानी होती है तो वज्रासन में कुछ देर बैठ जाएं और पीठ को सीधा रखें। स्वस्थ शरीर की शुरुआत सही समय पर भोजन से होती है।